इस बार ‘रौद्र’ नामक संवत्सर रहेगा।जब भी कोई बर्ष में शुभ कार्य होगा रौद्र नामक संवत्सर का प्रयोग किया जाएगा इस सम्बतसर का प्रयोग होगा। इस वक्त सृष्टि के संम्वत् अनुसार 19558 85127 (१९५५९९५१२७) यहसृष्टि का बर्ष चला हुआ है सृष्टि को इतना समय हो गया है तथा विक्रम संवत 2083 चला हुआ है शक संवत 1948-49 (१९४८)होगा और कलियुग का समय अभी 5126(५१२६) वर्ष बीत चुका है तथा कलियुग वर्तमान 5127 (५१२७) बर्ष चल रहा है। जबकि कलियुग की कुल अवधि 432000 (४३२०००) बर्ष है।कृष्ण संवत 5262(५२६२) चला है ।श्री बुद्ध संवत 2649 (२६४९)महावीर जैन संवत 2551(२५५१) और हिजरी सन 1447 (१४४७)अंग्रेजी का2026(२०२६) खालसा का 327 (३२७) सृष्टि के अनुसार सतयुग का प्रमाण 1728000(१७२८०००) बर्ष तथा त्रेतायुग 1296000(१२९६०००)बर्ष द्वापर युग प्रमाण 864000(८६४०००) बर्ष कलयुग का प्रमाण 432000 (४३२०००)वर्ष का होता है।
(१) वि. संवत् २०८३ में संवत्सर एवं राजा-मन्त्री-आदि का फल
ईस संवत के अनुसार वि.संवत् 2083 का आरम्भ 19 मार्च 2026 को होगा। इस वर्ष का संवत्सर “रौद्र” माना गया है। ज्योतिष ग्रन्थों के अनुसार इस संवत्सर में राजनीतिक, सामाजिक और प्राकृतिक घटनाओं में कुछ विशेष परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं।
🔹 ‘रौद्र’ नामक नव-संवत्सर का फल (वि.सं. 2083)
नव विक्रम संवत 2083 का आरम्भ 19 मार्च 2026 (गुरुवार) को होगा।
इस वर्ष का नाम ‘रौद्र’ है। शास्त्रों के अनुसार इस वर्ष कुछ स्थानों पर वर्षा सामान्य से अधिक तथा कहीं-कहीं कम होने की संभावना रहती है। कृषि-कार्य में उतार-चढ़ाव, राजनीतिक हलचल तथा सामाजिक परिवर्तन के संकेत मिलते हैं।
राजनीतिक दृष्टि से शासन-व्यवस्था में कुछ कठोर निर्णय लिए जा सकते हैं। जनता के हित में कई नई योजनाएँ प्रारम्भ हो सकती हैं, किन्तु आर्थिक क्षेत्र में अस्थिरता भी देखी जा सकती है।
🔹 कृषि एवं वर्षा का फल
यदि वर्षा समय पर और संतुलित हुई तो कृषि उत्पादन अच्छा रहेगा।
कहीं-कहीं अधिक वर्षा के कारण बाढ़ की स्थिति भी बन सकती है। किसानों को सावधानी से खेती करने की आवश्यकता रहेगी।
🔹 समाज पर प्रभाव
समाज में नई तकनीकों और विचारों का प्रसार होगा। शिक्षा, विज्ञान और संचार के क्षेत्र में प्रगति होगी। किन्तु कुछ स्थानों पर सामाजिक तनाव भी देखने को मिल सकता है।
🔹 स्वास्थ्य
वि. संवत् 2083 के देश-पदाधिकारियों का फल
(1) वर्ष (वि. संवत् 2083) के राजा ‘गुरु’ का फल
“गुरौ नृपे वर्षति कामदं जलं महीतले कामदुधाश्च धेनवः।
यज्ञक्रिया विप्र बहुश्रोत्रिणो महोत्सवाः सर्वजनाः व्रते स्थिताः॥”
अर्थात् संवत् का राजा ‘गुरु’ (बृहस्पति) हो तो उस वर्ष कृषि-फसलों के लिए पर्याप्त वर्षा होती है। गाय-भैंस आदि चौपायों से पर्याप्त मात्रा में दूध प्राप्त होता है। ब्राह्मण तथा धर्मपरायण लोग यज्ञ, होम आदि शुभ कार्यों में संलग्न रहते हैं। समाज में धार्मिक उत्सवों की वृद्धि होती है।
व्यापार के लिए भी अनुकूल वातावरण रहता है। नए-नए उद्योगों का विकास होता है। कृषि उत्पादन तथा फलों की पैदावार अच्छी होती है। देश में शांति तथा समृद्धि का वातावरण बना रहता है।
(2) संवत् के मन्त्री ‘मंगल’ का फल
“अवनीशो नृ मन्त्रित्वां गतो भवति दस्युभयादिवेदनाः।
जनपदेषु ज्वरः सुखं संक्षिप्तं न वर्धते पुण्यकर्म च॥”
अर्थात् संवत् का मन्त्री ‘मंगल’ होने से उस वर्ष देश में जनता चोरों, लुटेरों आदि से भयभीत रह सकती है। रोगों का प्रकोप भी बढ़ सकता है। कुछ स्थानों पर अशांति तथा दुर्घटनाओं की घटनाएँ बढ़ने की संभावना रहती है।
(3) सस्येश ‘गुरु’ का फल
“कर्पटि सुशासन पुरोहित सकल साधकाः श्रुतिपाठकाः।
जलवृष्टि जलदा धान्यसमृद्धि धनसमृद्धिः॥”
अर्थात् गुरु (बृहस्पति) सस्येश होने पर वेद-शास्त्रानुसार धर्म-कर्म का पालन बढ़ता है। लोगों को सुख-शांति और कल्याण की प्राप्ति होती है। वर्षा पर्याप्त होती है तथा गेहूँ, धान आदि की पैदावार अच्छी होती है। कृषि और व्यापार करने वाले लोगों को अच्छा लाभ मिलता है।
(4) धान्येश ‘बुध’ का फल
“बहुसस्ययुक्ता पृथ्वी रसश्च वर्धते।
नीतियुक्ताः सदा भूपा बुधे धान्याधिके सति॥”
अर्थात् जिस वर्ष धान्यपति ‘बुध’ हो, उस वर्ष अच्छी वर्षा के कारण धान्य का उत्पादन पर्याप्त होता है। रसदार पदार्थों (दूध, घी, गुड़, तेल आदि) की प्रचुरता रहती है। शासन-तंत्र जनकल्याणकारी नीतियाँ बनाता है।
(5) मेषेश (वर्ष का स्वामी) ‘चन्द्र’ का फल
“शशिनि तोयदये यदि गोमहिषादयः क्षीरदुग्धा ददति।
फलवती धान्यसमृद्धि विविध भोगवती नृभूमिः॥”
अर्थात् वर्ष का स्वामी ‘चन्द्र’ होने पर गाय-भैंस आदि पशुओं से दूध की अधिक प्राप्ति होती है। गेहूँ, धान, चावल आदि की फसल अच्छी होती है। फलों-फूलों की पैदावार बढ़ती है और पृथ्वी विविध प्रकार के सुख-साधनों से सम्पन्न होती है।
(6) रसेश ‘शनि’ का फल
“रविस्ते रसेषु संसक्ताः न जलदा गदवश्च पयोदाः।
अजपावो राजपशवः खरोष्ट्रा जनपदेषु नरा न रंस्यन्ति॥”
अर्थात् ‘शनि’ रसेश होने पर कुछ स्थानों पर कठिनाइयाँ आ सकती हैं। पशुधन तथा जनजीवन पर मिश्रित प्रभाव देखने को मिलता है। लोगों को परिश्रम अधिक करना पड़ता है।
(7) नीरसेश (धान्येश के सहायक) ‘गुरु’ का फल
“शस्यवृद्धिर्भवेद् वर्षे धान्यं च बहुधा भवेत्।
नैतिकता च प्रजा मध्ये सुखं सर्वत्र वर्धते॥”
अर्थात् वर्ष में गुरु के प्रभाव से धान्य और फसलों की वृद्धि होती है। प्रजा में नैतिकता बढ़ती है तथा समाज में सुख-शांति का वातावरण रहता है।
(8) फलादेश ‘बुध’ का फल
“यदि बुधः फलदो भवेत् फलवन्तो वनस्पतयः।
वाणिज्ये वृद्धिमाप्नोति जनपदो हर्षमाप्नुयात्॥”
अर्थात् जब बुध फलादेश का कारक हो, तब वृक्षों में फल-फूल अधिक लगते हैं। व्यापार में वृद्धि होती है और जनपद में समृद्धि आती है।
(9) दुर्गेश ‘गुरु’ का फल
“दुर्गाणि च गुरु: पालयति नृपं धर्मेण संस्थितम्।
प्रजाः सुखेन वसन्ति च सर्वत्र विजयः भवेत्॥”
अर्थात् गुरु दुर्गेश होने पर राजा धर्म के अनुसार शासन करता है। राज्य में शांति रहती है और प्रजा सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करती है।
(10) दुर्गेश (सेनापति) ‘बुध’ का फल
“अर्थं च दुर्भिक्षनिवारणाय यत्नः।
पुरुषार्थवृद्धिः प्रजासुखं च॥”
अर्थात् बुध सेनापति होने पर शासन व्यवस्था प्रजा की समस्याओं को दूर करने का प्रयास करती है। आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होती है और जनसाधारण को लाभ मिलता है।
वर्षेश विचार
आनन्दादि संवत्सरों में ‘रौद्र’ नामक वर्ष का उल्लेख मिलता है। इस वर्ष में सामान्यतः कुछ क्षेत्रों में वर्षा अधिक तथा कुछ स्थानों पर कम होने की संभावना रहती है। फलस्वरूप कृषि उत्पादन में स्थान-स्थान पर भिन्नता दिखाई देती है।
नवमेश का फल
“रोगाणां विकलता बहुला भवेत्।
स्थानभ्रंशः कालान्तरालाद् यत्र नैव वर्षा जलं ददाति॥”
अर्थात् कुछ स्थानों पर रोगों की वृद्धि, वर्षा की कमी या असामान्य मौसम के कारण लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
दशमेश ‘राहु’ का फल
“तस्करभयमिदं नित्यं राजभयं च प्रजासु च।
राजकार्यमसिद्धिः स्यात् सर्वकार्येषु मन्दता॥”
अर्थात् राहु के प्रभाव से कुछ स्थानों पर चोरी-डकैती या प्रशासनिक कठिनाइयों की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।मैंने आपकी तस्वीर में जो पाठ दिखाई दे रहा है उसे जैसा है वैसा टाइप कर दिया है ताकि आप इसे आसानी से कॉपी कर सकें।
(7) नीरसेश (धानुओं के स्वामी) ‘गुरु’ का फल
“हरित पीतवस्त्राणि पीतवस्त्रादिकं च यत्।
नीरसेशो यदा जीवः सर्वेषां प्रीतिरस्ति॥”
अर्थात् नीरसेश अर्थात् धातु पदार्थों का स्वामी गुरु (बृहस्पति) होने से हल्दी, पीले वस्त्र, पीतल, सोना आदि पीले वर्ण की वस्तुओं की माँग बढ़ती है। इन वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होती है तथा लोगों की रुचि भी इनकी ओर अधिक रहती है।
(8) फलाधिप ‘चन्द्र’ का फल
“यदि चन्द्रः फलदः स्यात् फलवता वर्तते क्षितिः।
विज्ञानयुक्ता वसुधा नृपतयो न्यायपालनतत्पराः॥”
अर्थात् फलों का स्वामी चन्द्रमा होने पर पृथ्वी पर फलों की प्रचुरता रहती है। राजा प्रजा को न्याय और सुशासन प्रदान करने का प्रयास करते हैं। विभिन्न प्रकार के फल, फूल और वनस्पतियाँ अच्छी होती हैं।
(9) धनाधिप ‘गुरु’ का फल
“धनस्य च गुरु: द्विजवृद्धिपो वणिजां वर्धनः सुखदायकः।
फलति पुष्पित भूमिः सदा विविध द्रव्ययुक्ता भवेत्॥”
अर्थात् धन का स्वामी गुरु होने से व्यापारियों के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनती हैं। व्यापार और धन-संपत्ति में वृद्धि होती है। भूमि पर फसलें अच्छी होती हैं और लोगों को विविध प्रकार के संसाधनों की प्राप्ति होती है।
(10) दुर्गेश (सेनापति) ‘चन्द्र’ का फल
“अथ च दुर्गपतिश्चन्द्रः नृपवतां सुदृढं सुखिनः शुभशासनात्।
वृद्ध्यन्ते दुर्गाणि गोसंपदः नृपत्वं नरवीर्यपराक्रमाः॥”
अर्थात् यदि सेना का स्वामी चन्द्रमा हो तो राज्य में सुशासन और व्यवस्था बनी रहती है। वीरता और पराक्रम में वृद्धि होती है। गौ-सम्पदा और अन्य संसाधनों में वृद्धि होती है।
चतुर्थ फल विचार
आनन्दादि संवत्सरों में ‘पुष्कर’ नामक मेघ का भी उल्लेख मिलता है।
फल – “विविधपातकवृद्धिः”
अर्थात् समय-समय पर चोरी, कपट आदि पापकर्मों की वृद्धि हो सकती है। विभिन्न प्रकार के रोगों के कारण लोगों को कष्ट भी हो सकता है।
नवमेघ में ‘काल’ नामक मेघ का फल
“रोगतो विकलता व्युष्मता स्थानेषु कालहता।
कालानामजलदैर्वा यदा नैव वर्षति जलं बहु॥”
अर्थात् ‘काल’ नामक मेघ होने पर लोगों को रोग और कष्ट अधिक हो सकते हैं। वर्षा सामान्य से कम हो सकती है जिससे जनजीवन प्रभावित होता है।
द्वादश नागों में ‘तक्षक’ नामक नाग का फल





